Aaditya Hriday Stotr

ЁЯзШ Category: Stuti ЁЯУЕ 20/12/14

   सूर्य-(आदित्‍य हृदय स्‍त्रोत)  

प्रात: काल स्‍नानादि से निवृत हो दीप धूप प्रज्‍वलित कर जल का पात्र रख शारीरिक निरोगता एवं सुख शांति हेतु भगवान् सूर्य का ध्‍यान करते हुए आदित्‍य हृदय स्‍त्रोत का पाठ करें।

सूर्य आग का गोला नहीं नारायण हैं

‘श्री रामचन्‍द्रजी युद्ध से थककर चिन्‍ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिये उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख महात्‍मा अगस्‍त्‍य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिये आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले’।

‘सबके हृदय में रमण करने वाले महाबाहो राम! सय सनातन गोपनीय स्‍त्रोत सुनो। वत्‍स! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्‍त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे। इस गोपनीय स्‍त्रोत का नाम है ‘आदित्‍यहृदय’। यह परम पवित्र और सम्‍पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय की प्राप्ति होती है। यह नित्‍य अक्षय और परम कल्‍याणमय स्‍त्रोत है। सम्‍पूर्ण मंगलों का भी मंगल है। इससे सब पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्‍ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्‍तम साधन है’।

भगवान् सूर्य अपनी अनन्‍त किरणों से सुशोभित हैं। ये नित्‍य उदय होने वाले, देवता और असुरों से नमस्‍कृत, विवस्‍वान् नाम से प्रसिद्ध, प्रभा का विस्‍तार करने वाले और संसार के स्‍वामी हैं। तुम इनका पूजन करो। सम्‍पूर्ण देवता इन्‍हीं के स्‍वरूप हैं। ये तेज की राशि तथा अपनी किरणों से जगत् जो सत्‍ता एवं स्‍फूर्ति प्रदान करने वाले हैं। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित सम्‍पूर्ण लोकों का पालन करते हैं। ये ही ब्रह्मा, विष्‍णु, शिव, स्‍कन्‍ध, प्रजापति, इन्‍द्र, कुबेर, काल, यम, चन्‍द्रमा, वरुण, पितर, वसु, साध्‍य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुञ्ज हैं। इन्‍हीं के नाम आदित्‍य, सविता, सूर्य, खग, पूषा, गभस्तिमान्, तिमिरोन्‍मथन, शम्‍भु, त्‍वष्‍टा, मार्तण्‍डक, अंशुमान, हिरण्‍यगर्भ, शिशिर, तपन, अहस्‍कर, रवि, अग्निगर्भ, अदितिपुत्र, शङ्ख, शिशिरनाशन, व्‍योमनाथ, तमोभेदी, ऋग्, यजु: और सामवेद के पारगामी, घनवृष्टि, अपां मित्र, विन्‍ध्‍यवीथीप्‍लवङ्गम, आतपी, मण्‍डली, मृत्‍यु, पिङ्गल, सर्वतापन, कवि, विश्‍व, महातेजस्‍वी, रक्‍त, सर्वभवोद्भव, नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्‍वामी, विश्‍वभावन, तेजस्वियों में भी अति तेजस्‍वी तथा द्वादशात्‍मा हैं। इन सभी नामों से प्रसिद्ध सूर्यदेव आपको नमस्‍कार है।‘ उदयाचल ताथा अस्‍ताचल के रूप में आपको नमस्‍कार है। ग्रहों और तारों के स्‍वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है। आप जयस्‍वरूप तथा विजय और कल्‍याण के दाता हैं। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारंबार नमस्‍कार है। सहस्‍त्रों किरणों से सुशोभित भगवान् सूर्य! आपकेा बारंबार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्‍य नाम से प्रसिद्ध हैं, आपको नमस्‍कार है। उग्र, वीर-सूर्य देव को नमस्‍कार है। कमलों को विकसित करने वाले प्रचण्‍ड तेजधारी मार्तण्‍ड को प्रणाम है। आप ब्रह्मा, शिव और विष्‍णु के भी स्‍वामी हैं। सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमण्‍डल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्‍वाहा कर देने वाली अग्नि आपका ही स्‍वरूप है, आप रोद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्‍कार है। आप अज्ञान और अन्‍धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं। आपका स्‍वरूप अप्रमेय है। आप कृतातघ्‍न का नाश करने वाले, सम्‍पूर्ण ज्‍योतियों के स्‍वामी और देवस्‍वरूप हैं, आपको नमस्‍कार है। आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप अज्ञान का हरण करने वाले और विश्‍वकर्मा हैं, तम के नाशक प्रकाशस्‍वरूप और जगत् के साक्षी हैं, आपको नमस्‍कार है।

‘रघुनन्‍दन! ये भगवान् सूर्य ही सम्‍पूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुँचाते और वर्षा करते हैं। ये सब भूतों में अन्‍तर्यामी रूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं, देवता या और यज्ञों के फल भी ये ही है। सम्‍पूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएं होती है। उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं। राघव! विपत्ति में, कष्‍ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, दसे दु:ख नहीं भोगना पड़ता। इसलिये तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्र्वर की पूजा करो। इस आदित्‍य हृदय का तीन बार जप करने से कोई भी युद्ध में विजय प्राप्‍त कर सकता है। हे महाबाहो! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे।‘ यह कहकर अगस्‍त्‍यजी जैसे आये थे, उसी प्रकार चले गये। ‘उनका उपदेश सुनकर महातेजस्‍वी श्रीरामचन्‍द्रजी का शोक दूर हो गया। उन्‍होंने प्रसन्‍न होकर शुद्धचित्‍त से आदित्‍य हृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान् सूर्य की ओर देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उन्‍हें बड़ा हर्ष हुआ। फिर परम पराक्रमी रघुनाथ जी ने धनुष उठाकर रावण की ओर देखा और उत्‍साहपूर्वक विजय पाने के लिये वे आगे बढ़े। उन्‍होंने पूरा प्रयत्‍न करके रावण के वध का निश्‍चय किया। उस समय देवताओं के मध्‍य खड़े हुए भगवान् सूर्य ने प्रसन्‍न होकर श्रीरामचन्‍द्रजी की ओर देखा और निशाचराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा- ‘रघुनन्‍दन! अब जल्‍दी करो’।

प्रार्थना: हे सूर्य भगवान्! आप असंभव को भी संभव करने वाले हैं। आप मुझ पर अपनी ही नहीं और भी देवी देवताओं की कृपा कराते हैं। मुझे कल्कि जी का काम करना है (एक या दो परेशानी बताकर) मुझे इनसे निकालो, मुझे रास्‍ता दो।

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