Introduction

Understanding the spiritual mission and divine purpose

 

जय राम हरे जय कृष्‍ण हरे, अब प्रगटो कल्कि रूप धरे

सन् 1989 में श्री कल्कि बाल वाटिका की स्‍थापना श्री कल्कि भगवान की कृपा से व गुरूदेव के आर्शीवाद से बी-2, बहादुर अपार्टमेंन्‍ट, दिल्‍ली-110 054 के एक कमरे में 9 सदस्‍यों के साथ प्रारम्‍भ हुई थी। श्री कल्कि बाल वाटिका समाज को कलियुग के युगावतार भगवान श्री कल्कि के अवतार के विषय में अवगत व जागरूक करना चाहती है तथा भारतीय संस्‍कृति, संस्‍कार व सनातन धर्म का रोपण आज के परिवेश में यहाँ के बालक व बालिकाओं में करना चाहती है, जो कि हमारे भारतवर्ष की जड़ है।

अपने सच्‍चे व निष्‍कपट उद्देश्‍य व लक्ष्‍यों के कारण आज भारत की राजधानी दिल्‍ली सहित कई राज्‍यों में इसकी शाखाऐं हैं। 

संस्‍था के सभी सदस्‍यों के योगदान से भगवान श्री कल्कि पर आधारित भजन संध्‍याऐं, गोष्ठियाँ, नाट्य मंचन किये गये। 

इसके साथ ही प्रचार कार्य श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए साहित्‍य व पुस्‍तकें वितरण की गई।

श्री कल्कि बाल वाटिका के सदस्‍यों द्वारा अनेक सिद्धपीठों व मन्दिरों में भगवान श्री कल्कि मूर्ति स्‍थापना करवाई गई।

संस्‍था के निकटतम व दूरगामी लक्ष्‍यों में अनेक मंदिरों से समन्‍वय स्‍थापित करने का प्रयास जारी है। जिनसे ज्‍यादा-से-ज्‍यादा ऋषि-मुनि, योग, ज्ञानी, साधु, तपस्‍वी, दानी, जो स्‍वर्ग से पतित होकर इस कर्मभूमि भारत पर जन्‍म ले चुके हैं या ले रहे हैं और माया के वशीभूत होकर इस कलियुग में भगवान श्री कल्कि की पुकार व प्रचार का अपना एकमात्र ध्‍येय भूल गए हैं, उनका मार्गदर्शन हो सके। कलियुग का नाश हो सतयुग की स्‍थापना हो, गौ ब्राह्मण, भक्‍त समुदाय, सनातन धर्म, भारतवर्ष का कल्‍याण हो।

 

 

जय श्री कल्कि

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