Gajendra Moksh Stotr (1)

ЁЯзШ Category: Stuti ЁЯУЕ 20/12/14

 

  गजेन्‍द्र मोक्ष स्‍तोत्र  

 

 

गजेन्‍द्र इस निश्‍चय के साथ मनको एकाग्रकर पूर्वजन्‍म में याद श्रेष्‍ठ स्‍तोत्र के द्वारा परम प्रभु की स्‍तुति करने लगा-

श्री हरि जगत् के मूल कारण हैं, और सबके हृदय में पुरुषरूप में विराजमान हैं एवं समस्‍त जगत् के एकमात्र स्‍वामी हैं, जिनके कारण इस संसार में चेतना जाग्रत् होती है – उन भगवान् के चरणों में मैं प्रणाम करता हूँ। प्रेमपूर्वक उन्‍हीं प्रभु का ध्‍यान करता हूँ। प्रलयकाल में सब कुछ नष्‍ट हो जाने पर भी जो महामहिम परमात्‍मा बने रहते हैं वे प्रभु मेरी रक्षा करें। नट की भाँति अनेक वेष धारण करनेवाले प्रभुका वास्‍तविक स्‍वरूप (एक रहस्‍य) देवता भी नहीं जानते, फिर अन्‍य कोई उसको कैसे वर्णन करे।। वे प्रभु मेरी रक्षा करें। जिन कल्‍याणमय प्रभु के दर्शन के लिये संत-महात्‍मागण सर्वस्‍व त्‍यागकर जितेन्द्रिय हो वन में अखण्‍ड तपश्र्चरण करते हैं, वे परमात्‍मा मेरी रक्षा करें। मैं सर्वशक्तिमान, सर्वैश्र्वर्यमय सर्वसमर्थ प्रभु के चरणों में नमस्‍कार करता हूँ। मैं जीवित रहना नहीं चाहता। इस अज्ञानमय योनि में रहकर मैं करूँगा ही क्‍या।। मैं तो आत्‍मप्रकाश को आच्‍छादित करने वाले अज्ञान के आवरण से मुक्त होना चाहता हूँ, जो कालक्रम से अपने-आप नहीं छूट सकता, किंतु केवल भगवत्‍कृपा और तत्‍त्‍वज्ञान द्वारा ही नष्‍ट होता है। अतएव मैं उन श्रीहरि के चरणों में प्रणाम करता हूँ, जिनकी कृपा से जीवन और मृत्‍यु के कठोर पाश से जीव सहज ही छूट जाता है। हे प्रभो! माया के वश होकर जीव अपने स्‍वरूप को नहीं जान पाता आपकी महिमा का पार नहीं है। आप अनादि अनंत सर्वशक्तिमान अन्‍तर्यामी एवम् सौंदर्य माधुर्य के निधि है। मैं आपकी शरण हूँ। आप मेरी रक्षा करें।

प्रार्थना: हे श्री हरि जैसे आपने अहंकारी गजेन्‍द्र की विपदा दूर करी। मेरे अहंकार का नाश करके विपत्तियों का निवारण करें। मुझे सुखीभाव से वैभवतापूर्वक श्री कल्कि जी का काम करना है।

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