Mritsanjeevan Kavach
मृतसञ्जीवनकवचम्
एवमाराध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्येश्र्वरम्।
मुतसञजीवनं नाम कवचं प्रजपेत् सदा।। 1 ।।
गौरी पति मृत्युञ्जजश्र्वेर भगवान् शंकर की विधिपूर्वक आराधना करने के पश्चात् भक्त को सदा मृतसञ्जीवन नामक कवच का सुस्पष्ट पाठ करना चाहिये। 1 ।
सारात् सरतरं पुण्यं गुह्याद् गुह्यतरं शुभम्।
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनाभिधम्।। 2 ।।
महादेव भगवान् शंकर का यह मत सञ्जीवन नामक कवच तत्त्व का भी तत्त्व है, पुण्यप्रद है, गुह्य से भी गुह्य और मंगल प्रदान करने वाला है। 2 ।
समाहितमना भूत्वा श्रृणुष्व कवचं शुभम्।
श्रुत्वैतद् दिव्यकवचं रहस्यं कुरु सर्वदा।। 3 ।।
(आचार्य शिष्य को उपदेश करते हैं कि – हे वत्स!) अपने मन को एकाग्र करके इस मृत सञ्जीवन कवच को सुनो। यह परम कल्याणकारी दिव्य कवच है। इसकी गोपनीयता सदा बनाये रखना। 3 ।
जराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवित:।
मृत्युञ्यो महादेव: प्राच्यां मां पातु सर्वदा।। 4 ।।
जरा से अभय करने वाले, निरन्तर या करने वाले, सभी देवताओं से आराधित हे मृत्युञ्जय महादेव! आप पूर्व-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें। 4 ।
दधान: शक्तिमभयां त्रिमुख: षड्भुज: प्रभु:।
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा।। 5 ।।
अभय प्रदान करने वाली शक्ति को धारण करने वाले, तीन मुखों वाले तथा छ: भुजाओं वाले अग्निरूपी प्रभु सदाशिव अग्नि कोण में मेरी सदा रक्षा करें। 5 ।
अष्टादशभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभु:।
यमरूपी महादेवो दक्षिणस्यां सदाऽवतु।। 6 ।।
अट्ठारह भुजाओं से युक्त, हाथ में दण्ड और अभयमुद्रा धारण करने वाले, सर्वत्र व्याप्त यमरूपी महादेव शिव दक्षिण-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें। 6 ।
खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवित:।
रक्षोरूपी महेशो मां नैर्ऋत्यां सर्वदाऽवतु।। 7 ।।
हाथ में खड्ग और अभयमुद्रा धारण करने वाले, धैर्यशाली, दैत्यगणों से आराधित रक्षोरूपी महेश नैर्ऋत्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें। 7 ।
पाशाभयभुज: सर्वरत्नाकर निषेवित:।
वरुणात्मा महादेव: पश्र्चिमे मां सदाऽवतु।। 8 ।।
हाथ में अभयमुद्रा और पाश धारण करने वाले, सभी रत्नाकरों से सेवित, वरुण स्वरूप महादेव भगवान् शंकर पश्चिम-दिशा में मेरी सदा रक्षा करें। 8 ।
गदाभयकर: प्राणनायक: सर्वदागति:।
वायत्यां मारुतात्मा मां शंकर: पातु सर्वदा।। 9 ।।
हाथों में गदा और अभयमुद्रा धारण करने वाले, प्राणों के रक्षक, सर्वदा गतिशील वायु स्वरूप शंकर जी वायव्यकोण में मेरी सदा रक्षा करें। 9 ।
शङ्खाभयकरस्थो मां नायक: परमेश्र्वर:।
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शंकर: प्रभु:।। 10 ।।
हाथों में शंख और अभयमुद्रा धारण करने वाले नायक (सर्वमार्गद्रष्टा) सर्वात्मा सर्वव्यापक परमेश्र्वर भगवान् शिव समस्त दिशाओं के मध्य में मेरी रक्षा करें। 10।
शूलाभयकर: सर्वविद्यानामधिनायक:।
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्र्वर:।। 11 ।।
हाथों में त्रिशूल और अभयमुद्रा को धारण करने वाले, सभी विद्याओं के स्वामी, ईशानस्वरूप भगवान् परमेश्र्वर शिव ईशानकोण में मेरी रक्षा करें। 11 ।
ऊर्ध्वभागे ब्रह्मरूपी विश्र्वात्माऽध: सदाऽवतु।
शिरो मे शंकर पातु ललाटं चन्द्रशेखर:।। 12 ।।
ब्रह्मरूपी शिव ऊर्ध्व भाग में तथा विश्र्वात्मस्वरूप शिव अघोभाग में मेरी सदा रक्षा करें। शंकर मेरे सिर की और चन्द्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें। 12 ।
भ्रूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिनेत्रोऽवतु लोचने।
भ्रूयुग्मं गिरिश: पातु कर्णौ पातु महेश्र्वर:।। 13 ।।
मेरे भौंहों के मध्य में सर्वलोकेश और दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान् शंकर रक्षा करें, दोनों भौहों की रक्षा गिरिश एवं दोनों कानों की रक्षा भगवान् महेश्र्वर करें। 13 ।
नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वत:।
पिनाकी मत्करौ पातु त्रिशूली हृदयं मम।। 15 ।।
मृत्युञ्जय मेरे मुख की एवं नागभूषण भगवान् शिव मेरे कण्ठ की रक्षा करें। पिनाकी मेरे दोनों हाथों की तथा त्रिशूली मेरे हृदय की रक्षा करें। 15 ।
पञ्चवक्त्र: स्तनौ पातु उदरं जगदीश्र्वर:।
नाभिं पातु विरूपाक्ष: पार्श्वे मे पार्वतीपति:।। 16 ।।
पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनों की और जगदीश्र्वर मेरे उदर की रक्षा करें। विरूपाक्ष नाभि की और पार्वतीपति पाश्र्र्वभाग की रक्षा करें। 16 ।
कटिद्वयं गिरीशो मे पृष्ठं प्रमथाधिप:।
गुह्यं महेश्र्वर: पातु ममोरू पातु भैरव:।। 17 ।।
महेश्वर मेरे गुह्य भाग की और भैरव मेरे दोनों उरुओं की रक्षा करें। 17 ।
जानुनी मे जगद्धर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका।
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्य: सदाशिव:।। 18 ।।
जगद्धर्ता मेरे दोनों घुटनों की, जगदम्बिका मेरे दोनों जंघों की तथा लोकवन्दनीय सदाशिव निरन्त मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें। 18 ।
गिरीश: पातु मे भार्यां भव: पातु सुतान् मम।
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायक:।। 19 ।।
गिरीश मेरी भार्या की रक्षा करें तथा भव मेरे पुत्रों की रक्षा करें। मृत्युञ्जय मेरे आयु की तथा गणनायक मेरे चित्त की रक्षा करें। 19 ।
सर्वाङ्ग मे सदा पातु कालकाल: सदाशिव:।
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभत्।। 20 ।।
कालों के काल सदाशिव मेरे सभी अंगों की रक्षा करें। ( हे वत्स!) देवताओं के लिये भी दुर्लभ इस पवित्र कवच का वर्णन मैंने तुमसे किया है। 20 ।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम्।
सहस्त्रावर्तनं चास्य पुरश्र्चरणमीरितम्।। 21 ।।
महादेव जी ने मृतसञ्जीवन नामक इस कवच को कहा है। इस कवच की सहस्त्र आवृत्ति को पुरश्र्चरण कहा गया है। 21 ।
य: पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत् सुसमाहित:।
सोऽकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते।। 22 ।।
जो अपने मन को सकाग्र करके नित्य इसका पाठ करता है, सुनता अथवा दूसरों को सुनाता है, वह अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयु का उपभोग करता है। 22 ।
हस्तेन वा यदा स्पृछ्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ।
आधयो व्याधयस्तस्य न भवन्ति कदाचन।। 23 ।।
जो व्यक्ति अपने हाथ से मरणासन्न व्यक्ति के शरीर का स्पर्श करते हुए इस मृतसञ्जीवन कावच का पाठ करता है, उस आसन्न मृत्यु प्राणी के भीतर चेतनता आ जाती है। फिर उसे कभी आधि-व्याधि नहीं होती है। 23 ।
कालमृत्युमति प्राप्तमसौ जयति सर्वदा।
अणिमादिगुणैश्र्वर्यं लभते मानवोत्तम:।। 24 ।।
यह मृतसञ्जीवन कवच काल के गाल में गये हुए व्यक्ति को भी जीवन प्रदान कर देता है और वह मानवोत्तम अणिमा आदि गुणों से युक्त ऐश्र्वर्य को प्राप्त करता है। 24 ।
युद्धारम्भे पठित्वेदमष्टाविंशतिवारकम्।
युद्धमध्ये स्थित: शत्रु: सद्य: सर्वैर्न दृश्यते।। 25 ।।
युद्ध आरम्भ होने के पूर्व जो इस मृतसञ्जीवन कवच का 28 बार पाठ करके रणभूमि में उपस्थित होता है, वह उस समय सभी शत्रुओं से अदृश्य रहता है। 25।
न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै।
विजयं लभते देवयुद्धमध्येऽपि सर्वदा।। 26 ।।
यदि देवताओं के भी साथ युद्ध छिड़ जाये तो उसमें उसका विनाश ब्रह्मास्त्र भी नहीं कर सकते, वह विजय प्राप्त करता है। 26 ।
प्रातरुत्थाय सततं य: पठेत् कवचं शुभम्।
अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च।। 27 ।।
जो प्रात:काल उठकर इस कल्याणकारी कवच का सदा पाठ करता है, उसे इस लोक तथा परलोक में भी अक्षय्य सुख प्राप्त होता है। 27 ।
सर्वव्याधिविनिर्मुक्त: सर्वरोगविविर्जित:।
अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिक:।। 28 ।।
वह सम्पूर्ण व्याधियों से मुक्त हो जाता है, सब प्रकार के रोग उसके शरीर से भाग जाते हैं। वह अजर-अमर होकर सदा के लिए सोलह वर्ष वाला व्यक्ति बन जाता है। 28 ।
तस्मादिदं महागोप्यं कवचं समुदाहृतम्।
मृतसंजीवनं नाम्ना दैवतैरपि दुर्लभम्।। 29 ।।
इस लोक में दुर्लभ भोगों को प्राप्त कर सम्पूर्ण लोगों में विचरण करता है। इसलिए इस मह्मगोपनीय कवच की मृतसंजीवन नाम से कहा है। यह देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। 29 ।
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