Bhairav Kavach
रुद्रयामलोक्त: श्रीबटुक-भैरव-ब्रह्म कवचराज:
भगवती पार्वती द्वारा हठपूर्व ‘भैरव-कवच’ के पूछने पर भगवान् शंकर ने कृपा करके जो ‘बटुकेश्वर ब्रह्मकवच’ बतलाया है, वह इस प्रकार है-
अथ विनियोग-(अस्य श्रीबटुकभैरवकवचराजस्य भैरवऋषि-रनुष्टुप्छन्द: श्री बटुकभैरवो देवता मम बटुकभैरव प्रसाद सिद्धयर्थे जपे विनियोग:।)
(इतना कहकर विनियोगार्थ जल छोड़ें तथा नीचे लिखे श्लोकों को बोलते हुए उन-उन सूचित स्थानों पर तत्त्वमुद्रा से स्पर्श करते हुए न्यास करें अथवा केवल भावना-पूर्वक पाठ करें।
ॐ पातु शिरसि नित्यं पातु हीं कण्ठदेशके।
बटुकाय पातु नाभौ चापदुद्धारणाय च।। 1 ।।
कुरुद्वयं लिङ्गमूले त्वधारे बटुकाय च।
सर्वदा पातु हीं बीजं बाहवोर्युगलमेव च।। 2 ।।
पडङ्गसहितो देवो नित्यं रक्षतु भैरव:।
ॐ हीं बटुकाय सततं सर्वाङ्ग मम सर्वदा।। 3 ।।
ॐ हीं पादौ महाकाल: पातु वीरासनेहृदि।
ॐ हीं काल: शिर: पातु कण्ठदेशे तु भैरव:।। 4 ।।
गणराट् पातु जिह्वायामष्टभि: शक्तिभि: सह।
दण्डपाणिर्गुह्यमूले भैरवी-सहितस्तथा।। 5 ।।
विश्वनाथ: सदा पातु सर्वाङ्गं मम सर्वदा।
अन्नपूर्णा सदा पातु चांसौ रक्षतु चण्डिका।। 6 ।।
असिताङ्ग शिर: पातु ललाटं रुरु भैरव:।
चण्डभैरव: पातु वक्त्रं कण्ठं श्रीक्रोध भैरव:।। 7 ।।
उन्मत्तभैरवत: पातु हृदयं मम सर्वदा।
नाभिदेशे कपाली च लिंङ्गे भीषण भैरव:।। 8 ।।
संहारभैरव: पातु मूलाधारं च सर्वदा।
बाहुयुग्मं सदा पातु भैरवो मम केवलम्।। 9 ।।
हंसबीजं पातु हृदि सोऽहं रक्षतु पादयो:।
प्राणापानौ समानं च उदानं व्यानमेव च।। 10 ।।
रक्षन्तु द्वारमूले तु दशदिक्षु समन्तत:।
प्रणव: पातु सर्वाङ्ग गं लज्जाबीजं महाभये।। 11 ।।
इति श्रीब्रह्मकवचं भैरवस्य प्रकीर्तितम्।
भैरव-तन्त्रोक्तं श्रीबटुक-भैरव: कवचम्
अस्य श्री बटुक-भैरव-कवचस्य आनन्दभैरव ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्द: श्री बटुकभैरवोदेवता बं बीजं ह्त्रीं शक्तिं
ॐ सहस्रारे महाचक्रे कर्पूरधवले गुरु:।
पातु मां बटुको देवो भैरव: सर्वकर्मसु।। 1 ।।
पूर्वस्यामसिताङ्गो मां दिशि रक्षतु सर्वदा।
आग्नेय्यां च रुरु: पातु दक्षिणे चण्डभैरव:।। 2 ।।
नैऋेत्यां क्रोधन: पातु उन्मत्त: पातु पश्चिमे।
वायव्यां मां कपाली च नित्यं पायात् सुरेश्वर:।। 3 ।।
भीषणो भैरव: पातु उततरस्यां तु सर्वदा।
संहारभैरव: पायादीशान्यां च महेश्वर:।। 4 ।।
ऊर्ध्वं पातु विधाता च पाताले नन्दको विभु।
सद्योजातस्तु मां पायात् सर्वतो देवसेवित:।। 5 ।।
वामदेवो वनान्ते च वनेऽघोरस्तथाऽवतु।
जले तत्पुरुष: पातु स्थले ईशान एव च।। 6 ।।
डाकिनीपुत्रक: पातु पुत्रान् मे सर्वत: प्रभु:।
हाकिनीपुत्रक: पातु दारांस्तु लाकिनी सुत:।। 7 ।।
पातु शाकिनिकापुत्र: सैन्यं वै कालभैरव:।
मालिनीपुत्रक: पातु पशूनश्वान् गंजास्तथा।। 8 ।।
महाकालेऽवतु क्षेत्रं श्रियं मे सर्वतो गिरा।
वाद्यं वाद्यप्रिय: पातु भैरवो नित्यसम्पदा।। 9 ।।
नमो भैरवदेवाय सर्वभूताय वै नम:।
नमस्त्रै लोक्यनाथाय नाथनाथाय वै नम:।। 10 ।।
ऐश्वर्यदायकं श्रीबटुक-भैरव-कवचम्
अस्य श्रीबटुक-भैरव-कवचस्य शिवब्रह्मऋषिरनुष्टुप् छन्द: श्रीबटुकभैरवो देवता ममैश्वर्यस्याभिष्टद्धयर्थं
श्री बटुक भैरवत: प्रसादसिद्धये जपे विनियोग:।
ध्यानम्
दिग्वासरां कमलपत्रविशालनेत्रं, भस्माड्गरागमभयं प्रभुमादिदेवम्।
ध्यायामि तं बटुकनाथमहर्निशं मे, सर्वार्थसिद्धिमतुलां कृपया दिशन्तम्।।
कवच-पाठ-शिरो मे भैरव: पातु, भलं पुर-निषूदन:।
दृशौ पातु त्रिनेत्री मे, श्रवणं नीलकण्ठक:।। 1 ।।
दिग्वासा मे पातु कण्ठं, नासिकाभगकन्यभाक्।
औष्ठौ त्रिपुरधाती मे, जिह्वां पातु कपालधृक।। 2 ।।
दन्तान् पातु क्रतुध्वंसी, चिबुकं भूतवासक:।
कपाली पातु मे ग्रीवां, स्कन्धौ पातु गजान्तक:।। 3 ।।
भुजौ मे पातु कौमारो, हृदयं क्षेत्र-पालक:।
अभीरुमें स्तनौ पातु, वक्ष: पातु महेश्वर:।। 4 ।।
कुक्षै मे पातु संहर्त्ता, नाभिं मे षण्मुखप्रिय:।
भूतनाथ: कटिं पातु, गुह्यं पातु जटाधर:।। 5 ।।
ऊरू पातु वृषारूढो, जानुनी भूतभावन:।
शमशानवासी मे पातु, पातु सर्वाङ्गमीश्वर:।। 6 ।।
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